नील विद्रोह|पावना विद्रोह|gk gs current|
नील विद्रोह 1806 से 1861
नील विद्रोह नील की खेती करने वाले किसानों का नीलहो के प्रति विद्रोह था| लॉर्ड कैनिंग तत्कालीन वायसराय ने इस विद्रोह के विषय में कहा था कि जितनी चिंता मुझे 1857 की क्रांति के विषय में थी उतनी इस विद्रोह की भी थी |
इस विद्रोह की शुरुआत बंगाल के नदिया क्षेत्र में हुई थी |इस विद्रोह का नेतृत्व विष्णु चरण विश्वास तथा दिगंबर विश्वास ने किया था |
इसकी जांच के लिए नील कमीशन बना ,इसके अध्यक्ष सेटनकर थे | इस आयोग ने 27 अगस्त 1860 ईस्वी में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें निलहो के विरुद्ध किसानों के आरोपों को सही बताया गया था |
नील किसानों के समर्थन में हिंदू पेैटियाट के संपादक हरीश चंद्र मुखोपाध्याय, रेवरेन्ड जेम्स लांग ,शिशिर कुमार घोष और दीनबंधु मित्र उल्लेखनीय हैं दीनबंधु मित्र इस विद्रोह पर नील दर्पण नामक नाटक लिखा था |
पावना विद्रोह 1872 से 1873
पावना विद्रोह बंगाल में जमीदारों के शोषण के खिलाफ था |
इसके नेतृत्व कर्ता ईशान चंद्र राय तथा उनके सहयोगियों में शंभू पाल महतो तथा खुदीमुल्ला प्रमुख थे |किसानों ने विरोध करने के लिए किसान संघ बनाया |
इस विद्रोह का ही परिणाम था कि 1885 मे बंगाल प्रजास्वत्व कानून पास हुआ, जिसके अनुसार जो कृषक किसी जमीन को बहुत समय से जोतते बोते आ रहा है ,उन्हें जमीन से बेदखल नहीं किया जा सकता |
इस आंदोलन को केंद्र में रखकर मुशर्रफ हुसैन ने एक नाटक जमीदार दर्पण लिखा था |
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